सब कुछ जान के भी अंजान रहते हैं वो,
मेरी जान लेकर भी बेजान रहते हैं वो.
पर जब गुज़रता हूँ में उनकी गली से,
तो मुझे दूर से ही पहचान लेते हैं वो.
और जब आता हूँ में उनके करीब,
उनकी सादगी का ये आलम है,
अपने होठों को मेरे होठों पर मेहमान लेते हैं वो.
Tuesday, April 26, 2011
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