जब से मोरे पिया गए परदेस,
आसमान में पूर्णिमा का चाँद भी आधा अधुरा नज़र आता है.
और अमावस की वो काली रात,
जिसके गुप अँधेरे में पहली बार चूमा था मैंने उनको,
दिल में एक मीठा सा दर्द पैदा कर जाती है,
और मुझे ये बताती है,
के थोड़ी सी हवस के बाद ही बहुत सा प्यार पनपता है
Monday, March 21, 2011
Tuesday, March 15, 2011
होंठ तो मिलते रहते हैं,पर चिपकते नहीं हैं
फिर वो मिली.
कई साल बाद.
गोद में एक बच्चा लिए.
बदन पहले से कुछ भर गया था,
और सामने के कुछ बाल सफ़ेद हो गए थे.
पेशानी पर झुरियां पद गयी थी.
ज़िन्दगी का तजुर्बा दिखने लगा था.
वक़्त किस्सी को नहीं छोडता...
हमारी नज़रें मिलीं,
आँखों ने आँखों से बातें की,
वो मेरी तरफ देखकर शायद मुस्कुराये भी.
पर होंठ से होंठ नहीं मिले,
वो होंठ जो कभी चिपक जाते थे,
साँसों की गहमा गहमी में....
तुम मेरे लिए एक पुराना ख्वाब बन कर रह गयी हो,
जो कभी कभी याद आता है,
भीड़ में तनहा कर जाता है,
और ये याद दिलाता है के..
आदमी ज़िन्दगी में मोहब्बत सिर्फ एक बार करता है...
प्यार तो कई बार होता है.
होंठ तो मिलते रहते हैं,
पर चिपकते नहीं हैं.
कई साल बाद.
गोद में एक बच्चा लिए.
बदन पहले से कुछ भर गया था,
और सामने के कुछ बाल सफ़ेद हो गए थे.
पेशानी पर झुरियां पद गयी थी.
ज़िन्दगी का तजुर्बा दिखने लगा था.
वक़्त किस्सी को नहीं छोडता...
हमारी नज़रें मिलीं,
आँखों ने आँखों से बातें की,
वो मेरी तरफ देखकर शायद मुस्कुराये भी.
पर होंठ से होंठ नहीं मिले,
वो होंठ जो कभी चिपक जाते थे,
साँसों की गहमा गहमी में....
तुम मेरे लिए एक पुराना ख्वाब बन कर रह गयी हो,
जो कभी कभी याद आता है,
भीड़ में तनहा कर जाता है,
और ये याद दिलाता है के..
आदमी ज़िन्दगी में मोहब्बत सिर्फ एक बार करता है...
प्यार तो कई बार होता है.
होंठ तो मिलते रहते हैं,
पर चिपकते नहीं हैं.
Monday, March 7, 2011
सारे मोहल्ले में दंगा मच गया
सुबह सुबह नींद से उठकर,
मेरी कमीज़ पहने,
balcony मैं जाकर जो तुमने ली अंगड़ाई,
सारे मोहल्ले में दंगा मच गया
मेरी कमीज़ पहने,
balcony मैं जाकर जो तुमने ली अंगड़ाई,
सारे मोहल्ले में दंगा मच गया
कई हसीं सुबहें यूँ भी गुजरीं हैं
कुछ कबूतर और कौवे और उड़े कायनात मैं,
मैं खुली खिड़की से उगते हुए सूरज को देख रहा था,
तुम अपने आप को ढकने के लिए मेरी t shirt पहन रही थी.
कई हसीं सुबहें यूँ भी गुजरीं हैं
मैं खुली खिड़की से उगते हुए सूरज को देख रहा था,
तुम अपने आप को ढकने के लिए मेरी t shirt पहन रही थी.
कई हसीं सुबहें यूँ भी गुजरीं हैं
Thursday, March 3, 2011
क्या चाँद भी अपनी चांदनी के लिए गरम है?
दिन भर की धुप से तप कर रात का कमरा गरम है.
मैं भी गरम हूँ, तुम भी गरम हो.
cross ventilation के लिए खुली खिडकियों से,
बादलों मैं छुपता छिपाता चाँद हममे छुप छुप कर देख रहा है.
क्या चाँद भी अपनी चांदनी के लिए गरम है?
मैं भी गरम हूँ, तुम भी गरम हो.
cross ventilation के लिए खुली खिडकियों से,
बादलों मैं छुपता छिपाता चाँद हममे छुप छुप कर देख रहा है.
क्या चाँद भी अपनी चांदनी के लिए गरम है?
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