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Friday, February 18, 2011
और पंखे चलने लगे ...
एक वो दिन भी थे,
जब पसीने से लतपत,
मैं और तुम,
हम और वो,
ज़मीन पर पड़े,
एक दुसरे पर फिसलते हुए,
प्यार करते थे.
फिर अन्दर की बिजली बाहर की बिजली बन गयी,
और पंखे चलने लगे
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लेकिन सब पलछिन...
गीली रात सूखा दिन
और पंखे चलने लगे ...
एक कमीना सा ख्वाब..
उनको आदत है...
चलो साथ मैं नहाते हैं
मैं तुम से प्यार तो नहीं करती, चाहती ज़रूर हूँ
गददे वाला प्यार
बेशर्म सी रातों मैं अक्सर शर्मीली बातें हो जाती हैं
न तुम मुस्कुराते न ये बात होती
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