Monday, February 21, 2011

गीली रात सूखा दिन

इक बरसात सी भीगी रात थी वो जब कार की पिछली सीट पर हमारे लब बार बार मिले थे,
और तुमने मेरे कानो मैं हलके से कहा था,
क्या यहीं प्यार है?
Wipers पूरी जोर से चल रहे थे.
आसमान भी बादलों से घिरा था.
फिर भी कार के शीशे से चिपकी तुम्हारी उँगलियों के बीच से मेरा चाँद मुझे नज़र आ रहा था.
एक वो तुम्हारी लबों सी गीली रात थी, और एक ये मेरे होठों सा सूखा दिन है

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